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एकता आर्थिक मंच (आर्थिक इकाई)

लोगों के अर्थव्यवस्था के विकास से संबंधित गतिविधियों को राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियों से स्पष्ट रूप से अलग करने के लिए एकता परिषद ने इसी क्षेत्र पर केन्द्रित एक विशिष्ट संगठनात्मक इकाई की स्थापना की है, जिसे एकता आर्थिक मंच कहा जाता है।

भू अधिकारों की लड़ाई में कुछ सफलताओं के बावजूद कई आदिवासी और दलित अपने गांव में आजीविका जुटाने में असमर्थ है और काम की तलाश में पलायन को मजबूर है। दुर्भाग्यवश जमीन अपने आप में इन परिवारों को आजीविका प्रदान करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यदि कृषि आय का एकमात्र साधन हो और आबंटित भूमि पर सफलतापूर्वक खेती की जाये, तो भी पूरे परिवार के लिए भोजन एवं अन्य बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति करना बेहद मुश्किल है। 

भारत सरकार के अनुसार, प्रति व्यक्ति औसत न्यूनतम आय (वेतन) विभिन्न राज्यों में 40 से 60 रुपए प्रतिदिन के बीच होती है। यदि एक महीने में 25 कार्यदिवस के आधार पर देखा जाये, तो इससे 1250 रुपए प्रति व्यक्ति प्रतिमाह का औसत निकलता है, जो 20 यूरो के बराबर है। इन अंकों से पता चलता है कि औसत आय जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करने के लिए पर्याप्तता से बहुत दूर है। बेरोजगारी और अल्परोजगार ग्रामीण भारत की प्रमुख समस्याएं हैं। कम से कम 10 प्रतिशत कार्यबल (वर्क फोर्स) बेरोजगारों की श्रेणी में आता है। इसके अलावा लगभग 30 प्रतिशत भारतीय कार्यबल आकस्मिक श्रमिकों का है, जो दैनिक मजदूरी में कामगार हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में ये कृषि श्रमिक हैं, जिनकी आय का कोई नियमित स्त्रोत नहीं है और न ही सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों तक कोई पहुंच है। 

स्थानीय प्राकृतिक संसाधन जैसे - वनोपज, पत्थर और खनिज पदार्थ, अतिरिक्त आय का एक संभावित स्त्रोत हैं लेकिन अधिकांश गरीब समुदायों का इन पर नियंत्रण का अभाव है। वे अवैध तरीकों से इन संसाधनों का उपयोग करने के लिए मजबूर हैं या फिर वे सरकार एवं जमींदारों (जो उन पर नियंत्रण कर उनका दोहन कर रहे हैं) द्वारा कम भुगतान किये जाने वाले शोषित श्रमिक हैं। 

अधिकांश क्षेत्रों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नियंत्रित करने में ऋण के एकमात्र उपलब्ध स्त्रोत होने के कारण साहूकारों की प्रमुख भूमिका है। कृषि ऋण का 72 प्रतिशत ऋण निजी साहूकारों से है। आदिवासी और दलित वर्ग प्रमुख रूप से इस तरह के शोषण के शिकार हैं। वे न केवल अत्यधिक उच्च ब्याज दर पर ऋण लेते हैं बल्कि वे ऋण की शर्तों के आधार पर कृषि निवेश हेतु संसाधन साहूकार से उच्च दाम पर खरीदने और कृषि उपज को अति कम दर पर साहूकारों को बेचने के लिए बाध्य हैं। इन परिस्थितियों में वे शायद ही इतना लाभ कमा सके कि वे अपने ऋणों का भुगतान कर सके। यानी वे और अधिक ऋण लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं या फिर कई बार अपनी जमीन गिरवी रखने तक के लिए बाध्य हो जाते हैं। 

गरीबी, बेरोजगारी, शोषण एवं पलायन की समस्याओं से ग्रामीण जनता को निकालने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास द्वारा ही मुकाबला किया जा सकता है। गरीब समुदायों के लोगों द्वारा जमीन और प्राकृतिक संसासधनों पर नियंत्रण दिलवाने और उन्हें शोषक साहूकारों, दलालों से मुक्त करवाकर, छोटे-छोटे उद्यम स्थापित करने में मदद करने जैसे कार्यों से ही उन परिवारों को आजीविका में सक्षम बनाया जा सकता है और उनके पलायन को रोका जा सकता है।

एकता परिषद ग्रामीण क्षेत्रों में जनाधार मजबूत कर राष्ट्रीय नेटवर्क बनाकर और आर्थिक रूप से शोषित समुदायों के बीच जमीनी स्तर पर कार्य करते हुए दशकों मजबूत स्थिति में है। एकता परिषद अपने कार्य अनुभव के आधार पर जनता की अर्थव्यवस्था के विकास एवं अति गरीबों की स्थिति सुधारने में सक्षम है। 
इसी कारण एकता परिषद हस्तक्षेप का समर्थन करता है क्योंकि भूमिहीनों के संघर्ष के अलावा यह कार्य उस आबादी के आर्थिक विकास के लिए मदद करता है ताकि वे स्वनिर्भर हो और न्यायपूर्ण एवं बेहतर आय प्राप्त कर सके। जमीनी स्तर पर एकता परिषद कई आर्थिक एवं विकास कार्यों में संलग्न हैं, जो उसके भू अधिकारों के संघर्ष के लिए किये जा रहे कार्यों का अभिवादन करता है। एकता परिषद समुदायों और समूहों के उत्पादों, हस्तशिल्प एवं ग्रामीण उद्योगों के उत्पादन जैसे - खादी, शहद, चावल, तेल एवं ऊन के उत्पादन और विक्रय में सहयोग प्रदान करती है। 

एकता परिषद विभिन्न कार्यपद्धतियों का विकास करना चाहती है, जिससे विकास का एक सतत् माॅडल का निर्माण हो, पर्यावरण के प्रति जागरूकता हो, जिससे कि स्थानीय स्तर पर अधिकतम उत्पादन और लाभ हो सके। पर साथ ही पर्यावरण और समुदायों पर इनके विपरीत प्रभाव को कम से कम किया जा सके। परिणामस्वरूप सीमांत आबादी को बढ़ावा मिले, जिससे वे जैविक खेती करंे और परिस्थितिक तंत्र का भी संरक्षण हो (उदाहरण के तौर पर वृक्षारोपण परियोजना की शुरुआत)। एकता परिषद की आर्थिक इकाई (मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) का उद्देश्य आदिवासी और दलित समुदायों के छोटे एवं मध्यम समुदायों, समूहों के उद्यमों का नेटवर्क बनाना है। इसे शशि सेंटर मदुरई द्वारा तमिलनाडु और केरल में भी विस्तारित किया गया है। इन कार्यों की सफलता हमारे मीडिया अनुभाग के दो नये अध्ययनों में देखा जा सकता है -


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